World Mental Health Day : मानसिक रोगों के उपचार की राह को आसान बना सकता है आयुर्वेद
Mental Health : मन चंचल प्रवृत्ति और बडा ही संवेदनशील होता है। हमारे पौराणिक ग्रंथों में मन के विषय में कई महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख मिलता है। मानव व्यवहार (Human Behavior) को समझने वाले हमारे ऋषि-मुनियों और विद्वानों ने मन को नियंत्रित रखने की महत्वूपर्ण सलाह दी है। मन की वृत्ति को नियंत्रित कर एक साधारण इंसान अपने जीवनकाल में महानतम स्थान प्राप्त कर सकता है, तो दूसरी ओर इसी मन को बेलगाम छोडकर और इसे नियंत्रित करने के बजाए खुद इसके नियंत्रण में आने से इंसान अपने जीवनकाल के निम्न स्तर तक भी पहुंच सकता है।
कुलमिलाकर देखा जाए तो जीवन और मन के बीच गहरा संबंध है। शरीर की तरह ही मन को स्वस्थ (Mental Health) रखने की जरूरत है। अगर मन व्यथा, अवसाद और पीडा से प्रभावित हो जाए, तो यह मानसिक रोगों की वजह बन सकता है। आज के जमाने में मानसिक स्वास्थ्य और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि आपके आसपास आपको विचलित करने की कई वजहें मौजूद है।
मानसिक रोगों (mental illness) की सफल चिकित्सा के लिए हॉलिस्टिक अप्रोच जरूरी
मानसिक रोगों की सफल चिकित्सा के लिए समग्र दृष्टिकोण (हॉलिस्टिक अप्रोच) अपनाने की जरूरत है। आयुर्वेद इस दिशा में बेहद मददगार साबित हो सकता है। इसकी पंचकर्म थेरेपी, योग, बिहेवियरल थेरेपी, मेडिटेशन आदि अन्य थेरेपी मानसिक स्वास्थ्य को बल प्रदान करती है। भले ही मरीज आयुर्वेद, होम्योपैथी, यूनानी, एलोपैथी, सिद्ध चिकित्सा जैसी किसी भी चिकित्सा पद्धति की दवाइयां ले रहा हो लेकिन आयुर्वेद की इन थेरेपियों से मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत रखने की दिशा में गुणवत्तापूर्ण लाभ मिलता है।
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क्या है सत्व बल ?

मानसिक रोगों (mental illnesses) से बचाव और चिकित्सा में सत्व बल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। व्यवहार, भावनाओं, मूड या सोच में नकारात्मक बदलाव आने पर मानसिक रोग की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। सामाजिक समस्याओं, परिवार या काम धंधे से संबंधित दिक्कतों या तनाव की वजह से भी मानसिक रोग हो सकते हैं। ये विकार न केवल व्यक्ति के काम को प्रभावित करते हैं बल्कि सामाजिक रिश्तों और पारिवारिक जीवन पर भी इसका असर पड़ता है।
उच्च स्तर के सत्व बल वाले व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी मानसिक रोगों की गिरफ्त में नहीं आ पाते। आयुर्वेद में मन को सत्व कहा गया है। आहार – विहार के अलावा मन, वचन और कर्म में सात्विकता होने से सत्व बल का निर्माण होता है। इसके विपरीत आहार- विहार तथा मन, वचन और कर्म में राजसिक और तामसिक प्रभाव होने से व्यक्ति का सत्व बल कम हो जाता है। चरक संहिता के अनुसार शरीर में वात, पित्त, कफ, रज और तम दोषों की अधिकता होने पर पर मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं।
चित्तोद्वेग (चिंता), उन्माद (पागलपन), विषाद (डिप्रेशन) और अनिद्रा आदि मानसिक समस्याओं की गिरफ्त में किशोर और युवा तेजी से आते जा रहे हैं। मानसिक रोग (mental illness) के इलाज एवं मानसिक स्थिति को बेहतर करने के लिए आयुर्वेदिक उपचार के अंतर्गत सत्वावजय चिकित्सा (सत्व बल बढ़ाने के उपाय), पंचकर्म थेरेपी में से स्नेहन, स्वेदन, वस्ति व शिरोधारा और रसायन (शरीर व मन को शक्ति प्रदान करने वाले द्रव्य) शामिल हैं।
ये हैं दिमाग के लिए बेहतर आयुर्वेदिक टॉनिक
ब्राह्मी, अश्वगंधा, वच और जटामांसी जैसी जड़ी बूटियां दिमाग के लिए टॉनिक की तरह काम करती हैं। इसलिए मानसिक रोगों (mental illness)से बचाव और इलाज में इन जड़ी बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा ब्राह्मी रसायन, उन्माद गजकेसरी रस, अश्वगंधारिष्ट, स्मृतिसागर रस और सारस्वतारिष्ट भी मानसिक रोगों के इलाज में लाभकारी हैं। स्वस्थ जीवनशैली, नियमित व्यायाम, योग, प्राणायाम, ध्यान और आध्यात्म के माध्यम से मानसिक रोगों से बचाव और इलाज में मदद मिलती है।
कोरोना ने बढाया मानसिक रोग

कोरोना महामारी के बाद विभिन्न कारणों के चलते मानसिक रोगियों की संख्या में अनपेक्षित वृद्धि हुई है। वैश्विक स्तर पर प्रत्येक 8 में से एक व्यक्ति इस समय किसी न किसी प्रकार की मानसिक समस्या या तनाव से ग्रस्त है। देश में 10 से 19 साल के बीच की लगभग 13 प्रतिशत जनसंख्या डिप्रेशन, एंजायटी आदि मानसिक समस्याओं से जूझ रही है। मानसिक रोगियों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस वर्ष मानसिक स्वास्थ्य दिवस (World Mental Health Day) का थीम रखा है मानसिक स्वास्थ्य एक सार्वभौमिक मानव अधिकार है।
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मेंटल हेल्थ सिस्टम को मजबूत करने की जरूरत
देश में मानसिक चिकित्सा संबंधी सुविधाओं और प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों की संख्या अत्यंत कम है। मानसिक स्वास्थ्य की चिकित्सा के रूप में यह अधिकार सभी को मिल सके इसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में मनोचिकित्सा की व्यवस्था करना आवश्यक है। इससे रोगी की पहचान प्रारंभिक अवस्था में करना आसान हो जाएगा। इसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात चिकित्सकों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी प्रशिक्षण दी जाए, जिसमें आयुष चिकित्सा पद्धतियों व चिकित्सकों को भी शामिल किया जाए। इसके अलावा दवा के साथ अन्य विकल्पों पर भी ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। जिनमें, आध्यात्मिकता, योग, ध्यान, सत्संग, प्राणायाम आदि को सम्मिलित किया जाए।
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